सहरसा टाईम्स - Saharsa Times

पुरातन नारी और आधुनिक नारी के बीच है बड़ा फासला

नारी का महत्व हो रहा है कमतर …..
पुरुषों से कतपिय समझौता है नारी की बड़ी कमजोरी…….
बीणा बिसेन की खास रिपोर्ट—–
नारी का नाम आते ही पुरुषों की आँखों में एक अलग सी चमक और अंदर की खोह में एक अलग सी हलचल होने लगती है । नारी के बाह्य सौंदर्य की एक अलग गरिमा और महात्म है । उदाहरण के लिए एक कुरूप नारी सर्वगुण संपन्न है लेकिन जिस सम्मान की वह हकदार है, उसे आज वह सम्मान किसी भी सूरत में हासिल नहीं हो रहा है । ठीक इससे उलट जो नारी बाह्य सौंदर्य की अभिव्यक्ति से लैस है उसके थोड़े गुण उसे किवदंती की तरह सम्मान दिलाते हैं ।हमेशा याद रखिये की सम्मान देने के सारे पैमाने और सारी कसौटी पुरुषों के हाथों हैं । जिन नारियों के सौंदर्य से पुरुष रीझते हैं और जिन नारियों से पुरुषों की काम तृष्णा मिटती है, वैसी नारियों के सम्मान के साथ उनके पद में भी लगातार इजाफा होता है । एक तरफ कम उम्र की लडकियां जब शिक्षा ग्रहण कर रही होती हैं,तभी से ही वे अपने रिश्तेदार, गुरुजन,सहपाठी छात्र अथवा किसी पुरुष के काम कुंठा की शिकार हो जाती हैं । दूसरी तरफ बेहतर शिक्षा के नाम पर घर से बाहर दूसरे शहरों में जाकर शिक्षा ले रही लडकियां भौतिकवादी चमक–दमक में अंधी होने के साथ–साथ काम पिपासु भी हो जाती हैं । जाहिर तौर पर वहाँ भी पुरुष जात की काम तृष्णा की तुष्टि ही होती है । लेकिन इस जगह लड़कियां अधिक दोषी होती हैं ।वे पर पुरुषों और लड़कों को ज्यादा से ज्यादा निकटता देकर उनसे सांसारिक उपभोग की वस्तुएं,रूपये और अन्य सामान हासिल करती हैं और बदले में अपना शरीर परोसती हैं । हम खुद एक औरत हैं और औरत की मनोदशा से पूरी तरह से भिज्ञ हैं ।लडकियां डॉक्टर,इंजीनयर,एमबीए सहित कई डिग्रियां लेकर चाहे वह साईन्टिस्ट हों या फिर हवाई जहाज की होस्टेस, या फिर हवाई जहाज उड़ा रही हों, यौन शोषण से खुद को बचाकर नहीं रख पाती हैं । ज्ञानेन्द्रियों का जागृत रह पाना, सहज प्रक्रिया नहीं है ।  यह समाज पुरुष प्रधान है । आप लाख कोशिशें कर लें, नारियों लिए नियम और कायदे पुरुष ही तय करेंगे । नारी स्वतंत्रता की बात बेमानी है । नारी चाँद पर चली जाए लेकिन वह काम शोषण से कतई बच नहीं सकती हैं ।आदिकाल से ही नारी पुरुषों के लिए उपभोग की वस्तु और अकूत ऊर्जा संग्रहण की स्रोत्र रही हैं ।लाख कोशिशों के बाद भी ना तो पुरुषों की मानसिकता में कोई ख़ास बदलाव आये हैं और ना ही नारी खुद को “वस्तु” से ऊपर खुद को समझ पायी हैं ।आप विभिन्य प्रांतों के गर्ल्स हॉस्टल चले जाएँ ।

आप को यह जानकार हैरानी होगी की कुछेक को छोड़कर अधिकतर गर्ल्स हॉस्टल चकला घर में तब्दील हैं । समस्या बड़ी और विकट है ।नारी और पुरुष दोनों को अपनी मर्यादा और सीमाएं समझनी होगी ।एक दूसरे के हित–अनहित को अन्तः से समझना होगा ।नारी और पुरुष जीवन के दो पहिये हैं ।आज नैतिक संस्कार का विलोपन हो चुका है ।घर की पाठशाला से लेकर निचली कक्षाओं से नैतिक शास्त्र की पढ़ाई बेहद जरुरी है ।आज हिन्दुस्तान की विवाह संस्था बेमानी साबित हो रही है जबकि दूसरे देश इसे अपनाकर धन्य हो रहे हैं । मृत हो रहे भारतीय संस्कार को आज पुनर्जीवित करने की नितांत आवश्यकता है ।नारी और पुरुष को एक दूसरे की शरीरिक जरूरत की जगह दिली, मानसिक और रूहानी सःस्थिति को समझने की जरूरत है ।पुरुष को नारी के महान अस्तित्व को स्वीकारना होगा और नारी को अपने शौर्य में लौटना होगा ।तभी जाकर नारी सम्मान के बारे में सोचने की परिपाटी तैयार होगी ।वर्ना नारियों का सम्मान पर्व–त्यौहार और कागजों में ही सिमटकर रह जाएगा ।

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