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नारी अस्तित्व की तलाश अभी अधूरी है…..

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नारी अस्तित्व की तलाश अभी अधूरी है
पुरातन ग्रन्थों,शास्त्रों और वेदों में भी नारी के वास्तविक अस्तित्व की पारदर्शी और स्थापित चर्चा नहीं है
नारी पूज्या है ?नारी वस्तु है ?नारी भोग्या है ? यह विषय काफी गूढ़ है जिसपर संसय बरकरार है


© मुकेश कुमार सिंह की दो टूक


पुरातन ग्रन्थों,शास्त्रों और वेदों सहित आदिकालीन इतिहास में नारी के वास्तविक अस्तित्व की चर्चा समीचीन अर्थ और पूर्वाग्रह से मुक्त होकर नहीं की गयी है ।पूर्व के कतिपय विद्वानों ने नारी अस्तित्व की चर्चा की कोशिश जरूर की है लेकिन भूमिका से उपसंहार के बीच भटकते हुए,वे किसी वाजिब स्थापित निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके हैं ।नतीजतन नारी आधुनिक काल में भी ना केवल एक रहस्य बनकर रह गयी है बल्कि उसके अस्तित्व की लड़ाई आजतक जारी है ।भारतीय संस्कृति में नारी को सबसे ज्यादा महत्व दिया गया है ।कुंवारी कन्या से लेकर गर्भवती नारियों का चित्रण तो बेहद मार्मिक और ओजस्वी तरीके से किया गया है ।इसी भारतीय संस्कृति में नारी की पूजा भी होती है ।कई देवियाँ इस बात की तकसीद भी कर रही हैं ।कई साध्वी बहनों ने अपने तेज से कई किवदंती भरी गाथाएं भी लिख गयी हैं ।बाबजूद इसके नारी के अर्थपूर्ण अस्तित्व पर आजतक ग्रहण लगा हुआ है ।गौरतलब है की नारी अस्तित्व को पुरुष प्रधान समाज कभी भी ग्राह्य नहीं कर पाया है ।



आप समकालीन पारिवारिक परिवेश को देखें ।आज के कुछ महानगरों को छोड़ दें तो हमारे समाज में बच्चियों के परवरिश का तरीका लड़कों से पूर्णतया भिन्न और अलग है ।बालपन से ही लड़के और लड़की के परवरिश में फर्क रहता है ।हम खुले सफे से कहते हैं की परवरिश के इस फर्क भरे साँचे की निर्मात्री वह माता होती हैं,जो अपने बच्चों की परवरिश कर रही होती हैं ।एक छोटी बच्ची शुरूआती दौर में अपने माता–पिता के द्वारा निर्मित बंदिश के साँचे में पलती है ।जब वह बड़ी होती है,तो,भाई की बंदिश होती है ।विवाह संस्था के साथ जब उसे पर पुरुष के हाथों सौंपा जाता है,तो एक नए पुरुष के साँचे की बंदिश होती है ।फिर उस घर–परिवार के अपने नियम–कायदे और रिवायतें होती हैं ।सास–स्वसुर के साँचे अलग से कवच बने होते हैं ।जीवन की गाड़ी बढ़ती जाती है लेकिन बंदिश के दायरे कम नहीं होते हैं ।नारी का जीवन फिर बच्चा जनने से शुरू होती है और नाना प्रकार के बंधन और बंदिश में नवागत बच्चों की परवरिश होती है ।जीवन झंझावत,ऊहापोह और टोका–टोकी में गुजरता चला जाता है ।इस दरम्यान नारी का स्वतन्त्र अस्तित्व कहाँ दिखता है ?यहां यह समझना भी बेहद जरुरी है की नारी अस्तित्व के स्थापन में नारी खुद भी एक बड़ी बाधक है ।


आधी आबादी और नारी उत्थान से लेकर उनकी समृद्धि की बातें सिर्फ कागजों,तख्ती,बैनर और विभिन्य झण्डों में ही सिमटकर रह जाते हैं । विभिन्य महानगरों से लेकर कस्बों से अर्श पर पहुँचने वाली नारी का कोई वाजिब अस्तित्व है,इस खुशफहमी में नहीं रहिएगा ।ऊपर और सड़ांध और बदबू है ।हम डंके की चोट पर और ताल ठोंक कर कहते हैं की आसमान पर पहुँच चुकी नारी का अस्तित्व भी सिर्फ भोग्या के रूप में काबिज है ।नारी के अस्तित्व के स्थापन के लिए पुरुष और नारी दोनों की सोच में विशाल नैसर्गिक बदलाव की जरूरत है ।नारी को काम वासना से अलग देखने की जरूरत है ।हर नारी में एक बेटी,बहन और माँ के स्वरूप होते हैं ।नारी के अस्तित्व को उदाहरण से कभी स्थापित नहीं किया जा सकता है ।नारी के अस्तित्व के स्थापन के लिए खुद नारी और पुरुष दोनों को अपने चित्त को निर्मल करने होंगे ।वैसे हमारी नजर में नारी सदैव पूज्या हैं लेकिन वे पूज्या रही नहीं हैं ।


 

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